अनुच्छेद 226 पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हाई कोर्ट साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती
Article 226 | High Courts Cannot Reweigh Evidence Or Interfere With Factual Findings In Certiorari Jurisdiction : Supreme Court
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि High Court, Article 226 के तहत Certiorari Writ की शक्ति का उपयोग करते समय निचली अदालत (Subordinate Court) या Tribunal द्वारा रिकॉर्ड किए गए साक्ष्यों (Evidence) का दोबारा मूल्यांकन (Re-appreciation/Re-weighing) नहीं कर सकती और न ही सामान्य परिस्थितियों में तथ्यात्मक निष्कर्षों (Findings of Fact) में हस्तक्षेप कर सकती।
सबसे पहले Article 226 क्या है?
Article 226 भारतीय संविधान का वह प्रावधान है जिसके तहत High Court किसी व्यक्ति के Fundamental Rights तथा अन्य कानूनी अधिकारों (Legal Rights) की रक्षा के लिए Writ जारी कर सकती है।
High Court पाँच प्रकार की Writ जारी कर सकती है—
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Habeas Corpus
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Mandamus
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Certiorari
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Prohibition
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Quo Warranto
यह मामला Certiorari Writ से संबंधित है।
Certiorari क्या होती है?
Certiorari का अर्थ है—
High Court किसी निचली अदालत या Tribunal के आदेश की वैधता (Legality) की जांच करती है।
लेकिन इसका उद्देश्य अपील (Appeal) की तरह पूरे मामले की दोबारा सुनवाई करना नहीं है।
इस केस के Facts
इस मामले में परिवार की संपत्ति के बंटवारे (Partition) का विवाद था।
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कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।
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दूसरी तरफ, प्रतिवादियों ने कहा कि संपत्ति पहले ही वैध रूप से बेच दी गई है।
Trial Court ने क्या किया?
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गवाहों की गवाही सुनी।
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दस्तावेज़ देखे।
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दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं।
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फिर फैसला दिया।
First Appellate Court
हारने वाले पक्ष ने अपील की।
Appellate Court ने भी साक्ष्यों का मूल्यांकन किया और अपना निर्णय दिया।
फिर High Court क्यों गई?
एक पक्ष ने Article 226 के तहत High Court में Writ Petition दायर कर दी।
High Court ने निचली अदालत द्वारा दिए गए कुछ तथ्यात्मक निष्कर्षों (Findings of Fact) में बदलाव कर दिया।
यानी High Court ने स्वयं Evidence को दोबारा देखकर अलग निष्कर्ष निकाल लिया।
यहीं से विवाद Supreme Court पहुँचा।
Supreme Court के मुख्य Issues
Issue 1
क्या High Court Article 226 में Evidence का दोबारा मूल्यांकन कर सकती है?
Issue 2
क्या High Court निचली अदालत द्वारा निकाले गए Facts बदल सकती है?
Issue 3
Certiorari की सीमा (Scope) क्या है?
Supreme Court ने क्या कहा?
Supreme Court ने स्पष्ट कहा—
High Court Article 226 में Appellate Court की तरह काम नहीं कर सकती।
यानी High Court यह नहीं कह सकती—
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कौन-सा गवाह सही था।
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कौन-सा गवाह गलत था।
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कौन-सा दस्तावेज़ ज्यादा विश्वसनीय है।
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किस Evidence का वजन अधिक है।
यह सब काम Trial Court और Appellate Court का है।
Reweigh Evidence का अर्थ
मान लीजिए—
दो गवाह हैं।
पहला कहता है—
जमीन राम की है।
दूसरा कहता है—
जमीन श्याम की है।
Trial Court दोनों को सुनकर मान लेती है कि पहला गवाह अधिक विश्वसनीय है।
अब High Court Article 226 में यह नहीं कह सकती—
“मुझे दूसरा गवाह ज्यादा सही लगता है, इसलिए फैसला बदल देती हूँ।”
यही Reweighing of Evidence कहलाता है।
Supreme Court ने कहा—
ऐसा नहीं किया जा सकता।
Findings of Fact क्या होती हैं?
Finding of Fact का मतलब—
Court ने साक्ष्यों के आधार पर जो तथ्य स्थापित किए हैं।
उदाहरण—
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कौन मालिक है।
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हस्ताक्षर असली हैं या नकली।
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कब्जा किसके पास था।
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दुर्घटना किसकी गलती से हुई।
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कौन-सा गवाह विश्वसनीय है।
ये सभी तथ्यात्मक निष्कर्ष हैं।
इनमें High Court सामान्यतः Article 226 में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
High Court कब हस्तक्षेप कर सकती है?
High Court हस्तक्षेप कर सकती है यदि—
1. Jurisdictional Error
Court को मामला सुनने का अधिकार ही नहीं था।
2. Error of Law
कानून का गलत प्रयोग हुआ।
3. Violation of Natural Justice
जैसे—
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पक्षकार को सुनवाई का मौका नहीं मिला।
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Notice नहीं दिया गया।
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निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई।
4. No Evidence
फैसला बिना किसी साक्ष्य के दिया गया हो।
5. Patent Illegality
निर्णय स्पष्ट रूप से अवैध या मनमाना हो।
High Court क्या नहीं कर सकती?
High Court—
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Evidence का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।
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गवाहों की विश्वसनीयता तय नहीं कर सकती।
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नए तथ्य नहीं बना सकती।
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Appellate Court की तरह पुनः सुनवाई नहीं कर सकती।
Supreme Court का निर्णय (Held)
Supreme Court ने कहा—
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High Court ने अपनी सीमा (Jurisdiction) से बाहर जाकर कार्य किया।
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उसने निचली अदालत के तथ्यात्मक निष्कर्षों में अनावश्यक हस्तक्षेप किया।
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यह Article 226 के दायरे से बाहर है।
इसलिए High Court का आदेश रद्द (Set Aside) कर दिया गया।
Ratio Decidendi (मुख्य कानूनी सिद्धांत)
Article 226 के अंतर्गत Certiorari Writ का उद्देश्य केवल यह देखना है कि निचली अदालत ने कानून के अनुसार और अपने अधिकार-क्षेत्र में रहकर निर्णय दिया या नहीं। High Court साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन (Re-appreciation of Evidence) या तथ्यात्मक निष्कर्षों (Findings of Fact) में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जब तक कि निर्णय अधिकार-क्षेत्र की त्रुटि, स्पष्ट कानूनी गलती, प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन या बिना किसी साक्ष्य के आधारित न हो।
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Article 226 High Court को Writ जारी करने की शक्ति देता है।
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Certiorari एक Supervisory Writ है, Appellate Remedy नहीं।
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High Court Evidence का Re-appreciation नहीं कर सकती।
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Findings of Fact में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं होगा।
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Trial Court ही गवाहों की विश्वसनीयता का सर्वोत्तम मूल्यांकन करती है।
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First Appellate Court भी Evidence का पुनर्मूल्यांकन कर सकती है।
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High Court केवल Legality की जांच करती है।
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Jurisdictional Error होने पर हस्तक्षेप संभव है।
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Natural Justice का उल्लंघन होने पर हस्तक्षेप संभव है।
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Article 226 का उद्देश्य न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) है, न कि दूसरी अपील (Second Appeal) प्रदान करना।