जमानत के प्रकार(Types Of Bail):-
भारतीय कानून में जमानत (Bail) का अर्थ है किसी आरोपी व्यक्ति को हिरासत से सशर्त रिहाई देना। जमानत का मुख्य आधार भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21) है, जो “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” (Right to Life and Personal Liberty) की गारंटी देता है। सुप्रीम कोर्ट का भी सिद्धांत है: “Bail is the rule, Jail is the exception” (जमानत नियम है, जेल अपवाद है)।
नीचे जमानत के प्रकार, उनके सेक्शन (नए और पुराने कानून के साथ) और पूरी जानकारी दी गई है:
1. नियमित जमानत (Regular Bail)
यह जमानत तब दी जाती है जब पुलिस ने किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया हो और वह पुलिस या न्यायिक हिरासत (Jail) में हो।
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कब मिलती है: जब आरोपी गिरफ्तारी के बाद कोर्ट में पेश किया जाता है।
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कानूनी धारा (Section):
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BNSS 2023 (नया कानून): धारा 480 (मजिस्ट्रेट द्वारा) और धारा 483 (सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा)।
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(पुराना CrPC: धारा 437 और 439)
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प्रक्रिया: इसके लिए आरोपी को वकील के माध्यम से कोर्ट में अर्जी लगानी होती है। अगर अपराध जमानती (Bailable) है, तो यह अधिकार के रूप में मिलती है। अगर गैर-जमानती (Non-Bailable) है, तो यह कोर्ट के विवेक (Discretion) पर निर्भर करता है।
2. अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail)
इसे साधारण भाषा में “गिरफ्तारी से पहले जमानत” कहा जाता है। यह तब ली जाती है जब किसी व्यक्ति को डर हो कि उसे किसी गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तार किया जा सकता है।
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कब मिलती है: पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने से पहले।
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कानूनी धारा (Section):
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BNSS 2023 (नया कानून): धारा 482।
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(पुराना CrPC: धारा 438)
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महत्वपूर्ण बात: यह जमानत सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट द्वारा दी जाती है। अगर यह मिल जाती है, तो पुलिस उस व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती, बल्कि उसे थाने से ही छोड़ना पड़ता है।
3. अंतरिम जमानत (Interim Bail)
यह एक अस्थायी (Temporary) जमानत होती है जो बहुत कम समय के लिए दी जाती है।
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कब मिलती है:
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जब नियमित या अग्रिम जमानत की अर्जी कोर्ट में पेंडिंग हो और सुनवाई में समय लग रहा हो।
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किसी आपातकालीन स्थिति में (जैसे घर में किसी की मृत्यु या गंभीर बीमारी)।
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समय सीमा: यह तब तक वैध रहती है जब तक कि कोर्ट नियमित जमानत पर अंतिम फैसला न सुना दे या दी गई समय सीमा (जैसे 15 दिन) समाप्त न हो जाए।
4. डिफ़ॉल्ट जमानत (Default Bail / Statutory Bail)
यह जमानत आरोपी का अधिकार (Right) है, जो उसे तब मिलती है जब पुलिस जांच में देरी करती है।
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कब मिलती है: यदि पुलिस निर्धारित समय के भीतर कोर्ट में चार्जशीट (Charge Sheet) दाखिल करने में विफल रहती है।
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मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले मामलों में: 90 दिन के अंदर।
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अन्य मामलों में: 60 दिन के अंदर।
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कानूनी धारा (Section):
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BNSS 2023 (नया कानून): धारा 187।
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(पुराना CrPC: धारा 167(2))
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नियम: अगर 61वें या 91वें दिन पुलिस चार्जशीट पेश नहीं करती, तो आरोपी को बेल पाने का पूरा हक होता है, चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो।
संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provision)
अनुच्छेद 21 (Article 21):
संविधान का यह अनुच्छेद कहता है कि “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।”
यही कारण है कि कोर्ट जमानत देते समय यह देखता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन न हो, बशर्ते वह सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करे या भाग न जाए।
यह रही जमानत (Bail) से जुड़ी विस्तृत जानकारी, जिसे आप अपनी वेबसाइट या सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सकते हैं। इसमें कानूनी धाराओं, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और आपकी वेबसाइट के प्रमोशन को प्रभावशाली तरीके से जोड़ा गया है।
जमानत: शर्तें, प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले
(Complete Guide on Bail Conditions, Cancellation & Landmark Judgments)
जमानत (Bail) मिलना केवल जेल से बाहर आना नहीं है, बल्कि यह कानून और कोर्ट द्वारा दी गई एक जिम्मेदारी है। यहाँ जानिए जमानत की शर्तें, बॉन्ड और इसे रद्द किए जाने के नियम।
1. जमानत की शर्तें (Conditions of Bail)
जब कोर्ट किसी आरोपी को जमानत देता है, तो वह यह सुनिश्चित करता है कि कानून का दुरुपयोग न हो। इसके लिए कोर्ट BNSS की धारा 480(3) (पुराने CrPC की धारा 437) के तहत कुछ विशेष शर्तें लगा सकता है:
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देश/शहर न छोड़ना: आरोपी बिना कोर्ट की अनुमति के देश या शहर छोड़कर बाहर नहीं जा सकता। अक्सर पासपोर्ट जमा करने का आदेश दिया जाता है।
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जांच में सहयोग: आरोपी को पुलिस बुलाने पर थाने में उपस्थित होना होगा और जांच में पूरा सहयोग करना होगा।
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गवाहों को न धमकाना: आरोपी पीड़ित पक्ष या गवाहों से संपर्क नहीं करेगा और न ही उन्हें डराएगा-धमकाएगा।
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सबूतों से छेड़छाड़ नहीं: आरोपी केस से जुड़े किसी भी सबूत को मिटाने की कोशिश नहीं करेगा।
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समान अपराध न करना: जमानत पर रहते हुए आरोपी दोबारा वैसा ही या कोई अन्य अपराध नहीं करेगा।
2. जमानत मुचलका (Bail Bond)
जमानत मिलते ही आरोपी को रिहा नहीं किया जाता, पहले उसे ‘बेल बॉन्ड’ भरना पड़ता है। यह एक तरह की आर्थिक गारंटी (Financial Guarantee) है।
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निजी मुचलका (Personal Bond): इसमें आरोपी खुद लिखित में वादा करता है कि अगर वह कोर्ट की तारीख पर नहीं आया, तो वह एक निश्चित राशि (जैसे ₹20,000) कोर्ट में जमा करेगा।
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जमानतदार (Surety): गंभीर मामलों में कोर्ट ‘जमानतदार’ मांगता है। यह कोई रिश्तेदार या दोस्त हो सकता है जो अपनी प्रॉपर्टी या FD के कागजात कोर्ट में दिखाता है और गारंटी लेता है कि “अगर आरोपी भागा, तो इसकी जिम्मेदारी मेरी होगी और मैं पैसे भरूंगा।”
3. जमानत रद्द होना (Cancellation of Bail)
जमानत कोई स्थायी अधिकार नहीं है। अगर आरोपी शर्तों का पालन नहीं करता है, तो कोर्ट BNSS की धारा 483(3) (पुराने CrPC की धारा 439(2)) के तहत जमानत रद्द कर सकता है।
कब होती है जमानत रद्द?
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अगर आरोपी गवाहों को डराता है या प्रभावित करता है।
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अगर आरोपी फरार हो जाता है या कोर्ट की तारीखों पर जानबूझकर नहीं आता।
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अगर आरोपी जमानत पर बाहर आकर दोबारा अपराध करता है।
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अगर यह पाया जाता है कि जमानत लेते समय कोर्ट से तथ्य छुपाए गए थे।
4. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (Landmark Judgments on Bail)
वकील के तौर पर आपको इन फैसलों का हवाला (Citation) जरूर देना चाहिए:
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स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम बालचंद (1977):
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक सिद्धांत दिया कि “Bail is the Rule, Jail is the Exception” (जमानत नियम है, जेल अपवाद है)। यानी किसी को बेवजह जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों (Article 21) का हनन है।
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अरनेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार (2014):
कोर्ट ने कहा कि 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में पुलिस सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। पहले धारा 41A का नोटिस देना होगा। इससे मनमानी गिरफ्तारियों पर रोक लगी।
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सतिंदर कुमार अंतिल बनाम CBI (2022):
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए नई गाइडलाइन्स जारी कीं और कहा कि जमानत याचिकाओं का निपटारा जल्द से जल्द (2 सप्ताह के भीतर) होना चाहिए।
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प्रस्तुति:- Adv. Satish Lodha(राजगढ़, मध्य प्रदेश)
Expert in Criminal & Constitutional Law