Supreme Court Annual Round Up 2025: Civil Procedure Code (CPC), 1908 – महत्वपूर्ण फैसले और बदलाव
वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) से जुड़े कई पुराने और जटिल मुद्दों को सुलझाया है। इन फैसलों का मुख्य उद्देश्य सिविल मुकदमों में होने वाली देरी को कम करना और कानूनी प्रक्रिया को स्पष्ट करना था। यहाँ 2025 के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों की पूरी जानकारी दी गई है।
1. Order 7 Rule 11: अर्जी को टुकड़ों में खारिज नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में एक बहुत ही स्पष्ट फैसला सुनाया कि Order 7 Rule 11 के तहत किसी भी वाद (Suit) को टुकड़ों में खारिज नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि अगर वादी ने कोर्ट में अर्जी दी है और उसमें कई मांगे (Reliefs) हैं, तो कोर्ट ऐसा नहीं कर सकता कि वह कुछ मांगों को खारिज कर दे और बाकी पर सुनवाई जारी रखे। नियम यह है कि अर्जी या तो पूरी तरह खारिज होगी या पूरी तरह स्वीकार की जाएगी। अगर अर्जी का कोई एक हिस्सा भी सुनवाई योग्य है, तो उसे खारिज नहीं किया जा सकता।
2. Res Judicata और Order 7 Rule 11 का संबंध
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि क्या ‘Res Judicata’ (पूर्व न्याय) के आधार पर केस को शुरुआत में ही खारिज किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Res Judicata एक कानून और तथ्यों का मिला-जुला सवाल है। यह सिर्फ अर्जी पढ़कर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए गवाही और सबूतों की जरूरत होती है। इसलिए, प्रतिवादी के कहने पर कि यह मामला पहले तय हो चुका है, कोर्ट सीधे Order 7 Rule 11 के तहत केस को खारिज नहीं करेगा। इसे ट्रायल के दौरान ही देखा जाएगा।
3. Order 8 Rule 1: जवाब दाखिल करने की समय सीमा
लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में कमर्शियल और सामान्य सिविल केसों में अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट एक्ट के तहत आने वाले मामलों में 120 दिन की समय सीमा अनिवार्य है। अगर 120 दिन के अंदर जवाब नहीं आया, तो अधिकार खत्म हो जाएगा। लेकिन, सामान्य सिविल मुकदमों में यह नियम इतना सख्त नहीं है। अगर कोई बहुत मजबूरी या उचित कारण हो, तो कोर्ट 90 दिनों के बाद भी जवाब स्वीकार कर सकता है, लेकिन यह वादी का अधिकार नहीं है, बल्कि कोर्ट का विवेक है।
4. Order 6 Rule 17: याचिका में संशोधन कब तक संभव है?
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि याचिका में संशोधन (Amendment of Pleadings) की अनुमति उदारता से दी जानी चाहिए ताकि विवाद का असली मुद्दा सुलझाया जा सके। लेकिन, अगर ट्रायल शुरू हो चुका है (गवाही शुरू हो गई है), तो संशोधन की अनुमति आसानी से नहीं मिलेगी। इसके लिए पार्टी को यह साबित करना होगा कि पूरी सावधानी बरतने के बावजूद वह यह तथ्य पहले कोर्ट के सामने नहीं ला सका था। अगर संशोधन से केस का पूरा नेचर बदल रहा हो, तो उसकी अनुमति नहीं दी जाएगी।
5. Section 100: दूसरी अपील और कानून का प्रश्न
हाई कोर्ट में दूसरी अपील (Second Appeal) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि धारा 100 के तहत दूसरी अपील तभी सुनी जानी चाहिए जब उसमें कानून का कोई ठोस प्रश्न (Substantial Question of Law) शामिल हो। हाई कोर्ट को दूसरी अपील में तथ्यों की दोबारा जाँच (Re-appreciation of evidence) नहीं करनी चाहिए। अगर निचली अदालतों ने तथ्यों पर सही फैसला दिया है, तो हाई कोर्ट को उसमें दखल नहीं देना चाहिए।
निष्कर्ष
2025 के ये फैसले बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट अब तकनीकी दांव-पेच की जगह त्वरित न्याय पर जोर दे रहा है। विशेष रूप से वादी की अर्जी खारिज करने और जवाब दाखिल करने के नियमों को और अधिक स्पष्ट कर दिया गया है ताकि मुकदमों का निपटारा जल्दी हो सके।
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