NHAI vs Gammon Atlanta: बिना बोर्ड के सेस वसूली अवैध- SC

NHAI vs Gammon Atlanta: उपकर (Cess) वसूली पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

1. परिचय (Introduction)

निर्माण क्षेत्र (Construction Sector) के लिए यह एक युगांतरकारी फैसला है जो सरकारी मनमानी पर लगाम लगाता है। 20 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (BOCW) उपकर’ केवल एक टैक्स नहीं, बल्कि एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए ली जाने वाली फीस है। कोर्ट ने व्यवस्था दी कि यदि राज्य सरकार ने श्रमिकों के कल्याण के लिए “कल्याण बोर्ड” (Welfare Board) का गठन नहीं किया है, तो डेवलपर्स या ठेकेदारों से उपकर नहीं वसूला जा सकता। यह निर्णय “कानून के शासन” (Rule of Law) को मजबूत करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सरकार बिना ढांचे (Infrastructure) के नागरिकों से पैसा इकट्ठा नहीं कर सकती।

2. मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)

यह विवाद एक राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के निष्पादन के दौरान उत्पन्न हुआ।

  • पक्षकार: अपीलकर्ता ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ (NHAI) और प्रतिवादी ठेकेदार ‘मैसर्स गैमन अटलांटा (जेवी)’ थे।

  • विवाद: परियोजना के दौरान, NHAI ने ठेकेदार के बिलों से 1% उपकर (Cess) काट लिया। यह कटौती ‘भवन और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम, 1996’ के तहत की गई थी।

  • मुख्य तर्क: ठेकेदार ने चुनौती दी कि जिस समय और जिस राज्य में यह कटौती की गई, वहां BOCW अधिनियम की धारा 18 के तहत कोई ‘कल्याण बोर्ड’ अस्तित्व में नहीं था। जब श्रमिकों को लाभ पहुंचाने वाली संस्था ही नहीं है, तो पैसा क्यों काटा गया?

  • कानूनी सफर: मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) ने ठेकेदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए NHAI को पैसा लौटाने का आदेश दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इसे बरकरार रखा। अंततः NHAI ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

3. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सिद्धांत (Core Principles Set by SC)

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले में तीन बड़े सिद्धांत स्थापित किए:

A. कल्याण बोर्ड ‘अनिवार्य शर्त’ है (Sine Qua Non)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपकर अधिनियम और BOCW अधिनियम एक-दूसरे के पूरक हैं। उपकर वसूलने का एकमात्र उद्देश्य कल्याण बोर्ड को वित्तपोषित करना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “कल्याण बोर्ड का गठन उपकर की लेवी और संग्रह के लिए एक अनिवार्य शर्त (sine qua non) है।” इसके बिना वसूली अवैध है।

B. उपकर का उद्देश्य (Purpose of Cess)

कोर्ट ने माना कि यह उपकर सरकार के राजस्व (Revenue) का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक ‘फीस’ की तरह है जिसका उपयोग केवल श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा लाभों के लिए किया जा सकता है। यदि खर्च करने वाला तंत्र (Board) गायब है, तो उपकर वसूलना कानून की मंशा के खिलाफ है।

C. तंत्र की विफलता (Failure of Machinery)

न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बोर्ड का गठन बाद में हो गया था। कोर्ट ने कहा कि जिस समय कटौती की गई, उस समय तंत्र (Machinery) विफल था, इसलिए वह कार्रवाई अवैध थी।

4. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और तर्क (Decision & Reasoning)

सुप्रीम कोर्ट ने NHAI की अपील को खारिज करते हुए ठेकेदार के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

  • सरकारों को फटकार: कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों की आलोचना की कि उन्होंने अधिनियम के लागू होने के दशकों बाद भी कई जगहों पर बोर्ड गठित नहीं किए।

  • पैसे की वापसी (Refund): कोर्ट ने आदेश दिया कि चूंकि NHAI ने बिना अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के पैसा काटा था, इसलिए उसे वह पूरी राशि ठेकेदार को वापस (Reimburse) करनी होगी।

  • अधिकार: कोर्ट ने माना कि एक ठेकेदार को उन गलत कटौतियों के खिलाफ रिफंड मांगने का पूरा अधिकार है जो वैधानिक तंत्र की अनुपस्थिति में की गई थीं।

5. इस फैसले का प्रभाव (Impact of Judgment)

यह निर्णय रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है:

  • वसूली पर रोक: अब सरकारी एजेंसियां (जैसे PWD, CPWD) केवल रूटीन मानकर बिलों से सेस नहीं काट सकेंगी। उन्हें पहले यह साबित करना होगा कि उस राज्य में कल्याण बोर्ड सक्रिय है।

  • रिफंड के रास्ते खुले: जिन पुरानी परियोजनाओं में बोर्ड के गठन से पहले सेस वसूला गया था, वहां कंपनियां अब इस फैसले (Precedent) का हवाला देकर रिफंड का दावा कर सकती हैं।

  • जवाबदेही: राज्य सरकारों पर अब दबाव होगा कि वे केवल टैक्स न वसूलें, बल्कि श्रमिकों के लिए वास्तविक कल्याणकारी ढांचे का निर्माण भी करें।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

‘NHAI बनाम गैमन अटलांटा (2026)’ का फैसला भारतीय श्रम कानूनों के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह स्थापित करता है कि प्रक्रिया (Procedure) का पालन किए बिना सत्ता का प्रयोग नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि “बिना बोर्ड के, कोई उपकर नहीं” (No Board, No Cess)। यह फैसला न केवल ठेकेदारों के अधिकारों की रक्षा करता है बल्कि सरकारों को उनकी सुस्ती के लिए जवाबदेह भी ठहराता है।


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