Supreme Court Digest 2025: Evidence Act और BSA पर साल के सबसे बड़े और लैंडमार्क फैसले

Supreme Court Yearly Digest 2025: Evidence Act और BSA पर साल के सबसे बड़े फैसले – एक नज़र में

 

 

Supreme Court Yearly Digest 2025: Evidence Act और BSA पर साल के सबसे बड़े फैसले – एक नज़र में

वर्ष 2025 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक परिवर्तनकारी वर्ष रहा है। पुराने ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872’ (Indian Evidence Act) और नए ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023’ (BSA) के बीच के संक्रमण काल (Transition Period) में सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्य यानी सबूतों को लेकर कई महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए हैं। इस राउंड-अप में हम जानेंगे कि इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस, गवाहों की विश्वसनीयता और नए कानून (BSA) के लागू होने पर कोर्ट ने क्या गाइडलाइन्स दी हैं।

1. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Electronic Evidence) और सेक्शन 63 BSA

2025 में सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल सबूतों की स्वीकार्यता (Admissibility) पर सबसे ज्यादा जोर दिया। पुराने कानून की धारा 65B की तरह, नए कानून (BSA) की धारा 63 के तहत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के साथ सर्टिफिकेट देना अनिवार्य कर दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब व्हाट्सएप चैट, सीसीटीवी फुटेज और ईमेल को सबूत मानने के लिए सख्त मानकों का पालन करना होगा। अगर सर्टिफिकेट नहीं है, तो ऐसे सबूतों को कोर्ट खारिज कर सकता है। यह फैसला साइबर क्राइम और डिजिटल फ्रॉड के मामलों में बहुत अहम साबित हुआ है।

2. ‘Last Seen Theory’ और परिस्थितिजन्य साक्ष्य

हत्या के मामलों में जहाँ कोई चश्मदीद गवाह नहीं होता, वहाँ ‘Last Seen Theory’ (अंतिम बार साथ देखा जाना) बहुत मायने रखती है। 2025 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि उसे मृतक के साथ आखिरी बार देखा गया था। अभियोजन पक्ष (Prosecution) को यह साबित करना होगा कि ‘Last Seen’ और हत्या के समय के बीच का अंतर इतना कम था कि किसी और व्यक्ति के आने की संभावना नहीं थी। परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) की कड़ियां पूरी तरह जुड़ी होनी चाहिए।

3. गवाहों का मुकर जाना (Hostile Witnesses)

गवाहों के बयान बदलने (Hostile होने) की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में फिर से अपनी स्थिति स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई गवाह कोर्ट में अपने पुलिस बयान से मुकर जाता है, तो भी उसकी गवाही को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। जज गवाही के उस हिस्से पर भरोसा कर सकते हैं जो अन्य सबूतों से मेल खाता है (Corroborated)। “Falsus in uno, falsus in omnibus” (एक बात में झूठा, तो सब में झूठा) का सिद्धांत भारत में सख्ती से लागू नहीं होता।

4. डिस्कवरी स्टेटमेंट: धारा 27 IEA बनाम धारा 23 BSA

हिरासत में दिए गए बयान और उससे बरामदगी (Recovery) को लेकर कोर्ट ने पुलिस की शक्तियों पर लगाम लगाई है। कोर्ट ने कहा कि धारा 27 (अब BSA की धारा 23) के तहत आरोपी द्वारा दी गई जानकारी तभी सबूत मानी जाएगी जब उससे कोई नई वस्तु या तथ्य (Fact) खोजा गया हो। पुलिस द्वारा पहले से पता लगाई गई चीजों की ‘बरामदगी’ दिखाना कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा। यह आरोपियों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ा कदम है।

5. पुराने बनाम नए कानून का टकराव (Retroactive Application)

2025 में वकीलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि 1 जुलाई 2024 से पहले के अपराधों पर कौन सा कानून लगेगा? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रक्रियात्मक कानून (Procedural Law) में बदलाव भूतलक्षी (Retrospective) हो सकता है, लेकिन अगर इससे आरोपी के अधिकार कम होते हैं, तो पुराना कानून (Evidence Act, 1872) ही लागू होगा। यानी, सबूतों के नियम उस समय के लागू कानून के हिसाब से चलेंगे जब अपराध हुआ था, न कि जब ट्रायल चल रहा है।


निष्कर्ष

2025 का यह ईयरली डाइजेस्ट दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट सबूतों की गुणवत्ता (Quality of Evidence) पर अब ज्यादा ध्यान दे रहा है, न कि केवल मात्रा पर। BSA के आने के बाद इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस पर कोर्ट की सख्ती यह बताती है कि न्यायपालिका डिजिटल युग के लिए पूरी तरह तैयार है।


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