Supreme Court Judgment: कानूनी वारिस न जोड़ने पर भी अपील खारिज नहीं होगी, अगर हितों का प्रतिनिधित्व मौजूद हो

Supreme Court Judgment: कानूनी वारिस न जोड़ने पर भी अपील खारिज नहीं होगी, अगर हितों का प्रतिनिधित्व मौजूद हो

Supreme Court का बड़ा फैसला: अगर मृतक के हितों का प्रतिनिधित्व मौजूद है, तो कानूनी वारिस न जोड़ने पर भी अपील खारिज (Abate) नहीं होगी

1. परिचय (Introduction)

सिविल मुकदमों में अक्सर देखा जाता है कि अगर केस के दौरान किसी एक पक्ष की मौत हो जाए और समय पर उसके कानूनी वारिसों (Legal Heirs) को रिकॉर्ड पर न लाया जाए, तो पूरा केस खारिज (Abate) मान लिया जाता है। यह नियम कई बार न्याय की राह में रोड़ा बन जाता था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस तकनीकी पेंच को सुलझाते हुए एक राहत भरा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर मृतक का हित (Interest) बाकी बचे लोगों द्वारा सुरक्षित है, तो सिर्फ वारिसों का नाम न जुड़ने से केस खत्म नहीं होगा। यह फैसला उन हजारों मुकदमों को जीवनदान देगा जो केवल प्रक्रियात्मक चूक की वजह से बंद हो जाते थे।

2. उपशमन (Abatement) का सामान्य नियम क्या है?

सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 22 के तहत, अगर किसी वादी या प्रतिवादी की मौत हो जाती है, तो 90 दिनों के भीतर उसके कानूनी वारिसों को केस में शामिल करना होता है। अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो मुक़दमा ‘Abate’ हो जाता है, यानी अपने आप समाप्त हो जाता है। यह नियम इसलिए है ताकि मृतक की संपत्ति या अधिकारों का फैसला उसकी गैर-मौजूदगी में न हो।

3. सुप्रीम कोर्ट ने क्या राहत दी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय का उद्देश्य तकनीकी नियमों में उलझना नहीं है। कोर्ट ने व्यवस्था दी कि अगर अपील में एक से अधिक अपीलकर्ता (Appellants) हैं और उनमें से किसी एक की मौत हो जाती है, तो अपील खारिज नहीं होगी, बशर्ते कि मृतक का हित (Interest) बाकी बचे हुए अपीलकर्ताओं द्वारा पर्याप्त रूप से दर्शाया जा रहा हो। उदाहरण के लिए, अगर एक संयुक्त परिवार की जमीन का केस है और परिवार का मुखिया मर जाता है, लेकिन बाकी सदस्य केस लड़ रहे हैं, तो वारिस न जोड़ने पर भी केस चलता रहेगा।

4. ‘एस्टेट’ (संपदा) का प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है

कोर्ट ने अपने फैसले में “Doctrine of Substantial Representation” (पर्याप्त प्रतिनिधित्व का सिद्धांत) पर जोर दिया। इसका मतलब है कि कोर्ट यह देखेगा कि क्या मृतक की संपत्ति (Estate) का बचाव करने वाला कोई है या नहीं? अगर रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य लोग उसी अधिकार के लिए लड़ रहे हैं जिसके लिए मृतक लड़ रहा था, तो अलग से वारिसों को जोड़ने की प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) को नजरअंदाज किया जा सकता है।

5. तकनीकी चूक से न्याय नहीं रुकना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि प्रक्रियात्मक कानून (Procedural Law) न्याय की मदद करने के लिए होते हैं, न कि उसे रोकने के लिए। अगर वारिसों को न जोड़ने के पीछे कोई बुरी नीयत नहीं है और मृतक के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा है, तो कोर्ट को उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। पूरी अपील को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना क्योंकि एक पक्ष के वारिस का नाम नहीं जुड़ा, न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।


निष्कर्ष

यह फैसला सिविल लिटिगेशन में एक बड़ा बदलाव है। यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके कानूनी अधिकारों की लड़ाई सिर्फ इसलिए खत्म न हो जाए क्योंकि उसके वकील या परिवार से कागज जमा करने में देरी हो गई। जब तक ‘हित’ सुरक्षित है, केस जिंदा रहेगा।

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