NDPS Act S. 37: ‘उचित आधार’ का मतलब ‘साबित’ होना नहीं- HC

S. 37 NDPS Act: ‘उचित आधार’ का मतलब ‘दोषमुक्त’ होना नहीं है – J&K&L हाई कोर्ट

1. परिचय (Introduction)

मादक पदार्थों (Drugs) से जुड़े मामलों में जमानत मिलना सबसे कठिन माना जाता है, खासकर जब मामला NDPS एक्ट की धारा 37 के तहत आता हो। हाल ही में जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण व्याख्या दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जमानत देते समय देखे जाने वाले “उचित आधार” (Reasonable Grounds) और नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के तहत “साबित” (Proved) होने में बड़ा अंतर है। कोर्ट ने कहा कि अगर जमानत के स्तर पर ही बेगुनाही को “साबित” मान लिया गया, तो यह जमानत देने की शक्ति को ही खत्म कर देगा।

2. मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)

यह मामला NDPS एक्ट के तहत एक आरोपी की जमानत अर्जी से जुड़ा है।

  • आरोप: आरोपी के पास से ‘वाणिज्यिक मात्रा’ (Commercial Quantity) में प्रतिबंधित पदार्थ (Contraband) बरामद होने का आरोप था।

  • कानूनी बाधा: NDPS एक्ट की धारा 37 कहती है कि वाणिज्यिक मात्रा के मामलों में जमानत तब तक नहीं दी जा सकती जब तक कि अदालत को यह विश्वास करने का “उचित आधार” न हो कि आरोपी दोषी नहीं है।

  • अभियोजन का तर्क: अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने तर्क दिया कि नए कानून (BSA) के तहत तथ्यों को कड़ाई से देखा जाना चाहिए और आरोपी को अपनी बेगुनाही “साबित” करनी चाहिए।

  • विवाद का मुख्य बिंदु: क्या धारा 37 के तहत “उचित आधार” का मतलब यह है कि कोर्ट को 100% यकीन होना चाहिए कि आरोपी निर्दोष है?

3. हाई कोर्ट के ऐतिहासिक सिद्धांत (Core Principles Set by HC)

न्यायमूर्ति (Justice) ने इस फैसले में कानून की व्याख्या करते हुए तीन मुख्य सिद्धांत स्थापित किए:

A. ‘उचित आधार’ बनाम ‘साबित’ (Reasonable Grounds vs Proved)

कोर्ट ने कहा कि धारा 37 में इस्तेमाल शब्द “उचित आधार” का मतलब यह नहीं है कि तथ्य पूरी तरह से “साबित” (Proved) हो गए हैं, जैसा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 2(1) में परिभाषित है। “साबित” होना मुकदमे (Trial) के अंत का निष्कर्ष है, जबकि “उचित आधार” केवल एक प्रारंभिक दृष्टिकोण (Prima Facie view) है।

B. जमानत की शक्ति का अस्तित्व (Existence of Bail Power)

हाई कोर्ट ने एक बहुत ही तार्किक बात कही:

“यदि ‘उचित आधार’ का अर्थ यह लिया जाए कि आरोपी ने अपनी बेगुनाही पूरी तरह साबित कर दी है, तो इसका मतलब होगा कि उसे बरी (Acquit) कर दिया गया है। अगर जमानत के चरण पर ही बरी होने जितना सबूत मांग लिया गया, तो धारा 37 के तहत जमानत देने का प्रावधान ही बेकार (Otiose) हो जाएगा।”

C. संभावित निर्दोषता (Probable Innocence)

अदालत को केवल यह देखना है कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से ऐसा लगता है कि आरोपी “संभवतः” दोषी नहीं हो सकता है। इसे “संदेह से परे” (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने की जरूरत इस चरण पर नहीं है।

4. निर्णय और तर्क (Decision & Reasoning)

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि NDPS के कड़े प्रावधानों का मतलब यह नहीं है कि आरोपी के संवैधानिक अधिकारों को कुचल दिया जाए।

  • BSA का संदर्भ: नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के तहत ‘साबित’ (Proved) का मानक बहुत ऊंचा है। कोर्ट ने कहा कि इस मानक को जमानत की सुनवाई पर लागू नहीं किया जा सकता।

  • तुलना: जमानत के लिए केवल “संभावनाओं की प्रबलता” (Preponderance of Probabilities) को देखा जाना चाहिए, न कि निश्चितता को।

  • निष्कर्ष: कोर्ट ने माना कि यदि आरोपी के खिलाफ प्रक्रियात्मक खामियां (जैसे तलाशी में गड़बड़ी) या सबूतों में विरोधाभास है, तो उसे धारा 37 का लाभ देकर जमानत दी जा सकती है, भले ही अभी अंतिम फैसला आना बाकी हो।

5. इस फैसले का प्रभाव (Impact of Judgment)

यह फैसला वकीलों और आरोपियों के लिए एक मजबूत हथियार है:

  • जमानत में आसानी: अब निचली अदालतें (Trial Courts) जमानत अर्जी खारिज करने के लिए यह नहीं कह सकेंगी कि आरोपी ने अपनी बेगुनाही “साबित” नहीं की है।

  • BSA का स्पष्टीकरण: नए कानूनों (BNSS/BSA) के लागू होने के बाद भ्रम की स्थिति थी, जिसे इस फैसले ने दूर किया है।

  • संतुलन: यह फैसला ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) के बीच संतुलन बनाता है।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट का यह निर्णय स्थापित करता है कि “संदेह” और “सबूत” के बीच एक लक्ष्मण रेखा है। धारा 37 की कठोरता का उपयोग जमानत को पूरी तरह से असंभव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। यह फैसला याद दिलाता है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, भले ही कानून NDPS जैसा सख्त क्यों न हो।


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