All India Judges Case: जजों की सेवा शर्तों पर ऐतिहासिक फैसला

 

All India Judges Case: जजों की सेवा शर्तों पर ऐतिहासिक फैसला

1. परिचय (Introduction)

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ‘ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ’ (All India Judges Association vs. Union of India) का मामला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि अधीनस्थ न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) के अधिकारों का ‘मैग्ना कार्टा’ है। लंबे समय तक जिला जजों और सिविल जजों को सामान्य सरकारी कर्मचारियों की तरह देखा जाता था। लेकिन इस ऐतिहासिक केस के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित किया कि “न्यायिक सेवा अन्य सरकारी सेवाओं से अलग और श्रेष्ठ है।” यह केस जजों के वेतन, पेंशन, आवास और कार्य स्थितियों में सुधार के लिए एक सतत चलने वाली प्रक्रिया (Continuing Mandamus) बन चुका है, जिसमें समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को सख्त निर्देश दिए हैं।

2. मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)

आजादी के बाद कई दशकों तक जिला न्यायालयों और निचली अदालतों के जजों की हालत बहुत खराब थी। उनके पास न तो रहने के लिए अच्छे घर थे, न ही काम करने के लिए लाइब्रेरी या स्टाफ। उनका वेतन (Salary) प्रशासनिक अधिकारियों (IAS/IPS) की तुलना में बहुत कम था।

  • मुख्य समस्या: सरकार जजों को भी ‘सिविल सेवक’ (Civil Servant) मानती थी और उन पर वही वेतन आयोग लागू करती थी जो क्लर्क या अफसरों पर लागू होता था।

  • याचिका: ‘ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन’ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि जजों के लिए एक अलग ‘वेतन आयोग’ (Pay Commission) बनना चाहिए और उनकी सेवा शर्तें एक समान होनी चाहिए।

3. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सिद्धांत (Core Principles Set by SC)

इस केस की सुनवाई के दौरान (विशेषकर 1993 और 2002 के फैसलों में) सुप्रीम कोर्ट ने तीन बड़े सिद्धांत तय किए:

A. जज ‘सरकारी कर्मचारी’ नहीं हैं (Judges are not Government Servants)

कोर्ट ने साफ कहा कि जजों की तुलना प्रशासनिक कार्यपालिका (Administrative Executive) से नहीं की जा सकती। जजों का काम “संप्रभु कार्य” (Sovereign Function) है। वे न्याय देते हैं, इसलिए उनकी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से सुरक्षित होना चाहिए।

B. अखिल भारतीय समानता (Uniformity across India)

पहले हर राज्य में जजों की सैलरी अलग-अलग थी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरे भारत में (कश्मीर से कन्याकुमारी तक) एक ही पद के जज का वेतन और भत्ता एक समान होना चाहिए।

C. वेतन आयोग (Judicial Pay Commissions)

कोर्ट के आदेश पर पहले ‘शेट्टी आयोग’ (Shetty Commission) और बाद में ‘पद्मनाभन आयोग’ का गठन हुआ। हाल ही में SNJPC (Second National Judicial Pay Commission) की सिफारिशों को लागू करने का आदेश दिया गया।

4. SNJPC और हालिया निर्देश (2023-2025 Updates)

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस केस में हाल ही में सबसे सख्त आदेश दिए हैं। दूसरे राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (SNJPC) की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा:

  • वेतन वृद्धि (Pay Revision): जजों के वेतन में भारी बढ़ोतरी की गई है, जो 1 जनवरी 2016 से प्रभावी मानी गई।

  • बकाया भुगतान (Arrears): कोर्ट ने राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा कि जजों का बकाया पैसा (Arrears) तुरंत किस्तों में दिया जाए। कई राज्यों ने फंड की कमी का बहाना बनाया, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

  • पेंशन (Pension): रिटायर्ड जजों की पेंशन को भी अपडेट किया गया है। अब जिला जजों को अंतिम वेतन का 50% पेंशन के रूप में मिलेगा।

5. जजों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाएं

सिर्फ सैलरी नहीं, इस केस में जजों की कार्य स्थितियों पर भी गौर किया गया:

  • गेस्ट हाउस और आवास: जजों के लिए सरकारी आवास अनिवार्य किया गया। अगर आवास उपलब्ध नहीं है, तो सरकार को मार्केट रेट पर किराया देना होगा।

  • डिजिटल सुविधाएं: हर जज को लैपटॉप, प्रिंटर और इंटरनेट भत्ता देने का आदेश दिया गया।

  • मेडिकल और सुरक्षा: जजों और उनके परिवारों को कैशलेस मेडिकल सुविधाएं और सुरक्षा प्रदान करना राज्य का कर्तव्य बताया गया।

6. राज्य सरकारों का रवैया और कोर्ट की सख्ती

इस केस की सुनवाई के दौरान कई बार केंद्र और राज्य सरकारों ने कहा कि “हमारे पास जजों की सैलरी बढ़ाने के लिए बजट नहीं है।” सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए एक प्रसिद्ध टिप्पणी की:

“आप जजों की तुलना चपरासी या क्लर्क से नहीं कर सकते। अगर आप चाहते हैं कि न्यायपालिका ईमानदार और कुशल रहे, तो आपको उन्हें अच्छा वेतन देना ही होगा। वित्तीय बोझ का बहाना नहीं चलेगा।”


निष्कर्ष (Conclusion)

‘ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन’ केस केवल जजों की सैलरी का मामला नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) का मामला है। 2025 तक आते-आते इस केस ने सुनिश्चित किया है कि भारत की निचली अदालतों के जज आत्मसम्मान के साथ काम कर सकें। यह फैसला नजीर है कि राज्य सरकारें न्यायपालिका को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं।

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