SC: केवल खुलासे पर सजा नहीं, सबूतों की कड़ी जरूरी

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1. परिचय (Introduction)

आपराधिक मुकदमों में अक्सर पुलिस आरोपी के ‘डिस्क्लोजर स्टेटमेंट’ (खुलासा बयान) और उसके आधार पर हुई बरामदगी (Recovery) को सबसे बड़ा सबूत मानती है। लेकिन क्या सिर्फ हथियार या सामान बरामद करवा देने से किसी को दोषी माना जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 (Section 27 Evidence Act) पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि केवल खुलासे के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। सजा के लिए सबूतों की पूरी कड़ी (Chain of Evidence) का जुड़ना अनिवार्य है।

SC: केवल खुलासे पर सजा नहीं, सबूतों की कड़ी जरूरी

2. धारा 27 और पुलिस की गलती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अक्सर जांच एजेंसियां केवल धारा 27 के तहत मिले सबूतों पर निर्भर हो जाती हैं। धारा 27 कहती है कि पुलिस हिरासत में आरोपी जो जानकारी देता है, उसमें से केवल उतनी ही बात सबूत मानी जाएगी जिससे कोई ‘तथ्य’ (जैसे हथियार, लाश, या चोरी का सामान) बरामद हुआ हो। लेकिन पुलिस इसे ही अपराध का पूर्ण प्रमाण मान लेती है, जो कानूनी रूप से गलत है।

3. ‘सबूतों की कड़ी’ (Chain of Evidence) पूरी होनी चाहिए

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) के मामलों में ‘चेन’ पूरी होनी चाहिए। इसका मतलब है:

  1. आरोपी की मंशा (Motive) साबित हो।

  2. उसे आखिरी बार मृतक के साथ देखा गया हो (Last Seen)।

  3. मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयान मेल खाते हों।

  4. बरामदगी (Recovery) सिर्फ इस कड़ी का एक हिस्सा है, पूरी तस्वीर नहीं। अगर बाकी कड़ियां गायब हैं, तो सिर्फ रिकवरी के आधार पर दोषसिद्धि (Conviction) नहीं हो सकती।

4. रिकवरी बयान की विश्वसनीयता

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 27 के तहत बयान और रिकवरी ‘स्वैच्छिक’ होनी चाहिए। अगर यह साबित नहीं होता कि बरामदगी वास्तव में आरोपी की जानकारी से ही हुई है, या अगर वह सामान किसी ऐसी जगह था जहाँ कोई भी जा सकता था (Public Place), तो उस रिकवरी का कोई महत्व नहीं रह जाता। डिस्क्लोजर स्टेटमेंट को अन्य स्वतंत्र सबूतों से पुष्ट (Corroborate) किया जाना जरूरी है।

5. संदेह का लाभ (Benefit of Doubt)

कोर्ट ने दोहराया कि जब तक अभियोजन पक्ष (Prosecution) संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) आरोप साबित नहीं कर देता, तब तक आरोपी को निर्दोष माना जाएगा। अगर रिकवरी और घटना के बीच की कड़ियां टूटी हुई हैं, तो उसका लाभ आरोपी को मिलेगा, चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पुलिस जांच के तरीके में सुधार की मांग करता है। यह स्पष्ट करता है कि शॉर्टकट तरीकों से सजा नहीं दिलाई जा सकती। न्याय के लिए पुलिस को सिर्फ इकबालिया बयान पर नहीं, बल्कि ठोस और वैज्ञानिक जांच पर ध्यान देना होगा।


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