RTE Act: जज और फेरीवाले के बच्चे साथ पढ़ें
1. परिचय (Introduction)
RTE Act: जज और फेरीवाले के बच्चे साथ पढ़ें:- शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) सिर्फ बच्चों को स्कूल भेजने का कानून नहीं है, बल्कि यह समाज में समानता और भाईचारा (Fraternity) लाने का एक जरिया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि RTE का असली सपना तब पूरा होगा जब एक जज का बेटा और एक सड़क पर सामान बेचने वाले (Street Vendor) का बेटा एक ही बेंच पर बैठकर पढ़ाई करेंगे। कोर्ट का मानना है कि जब अमीर और गरीब पृष्ठभूमि के बच्चे साथ पढ़ेंगे, तभी देश में सामाजिक दीवारें टूटेंगी और असली लोकतंत्र मजबूत होगा।
2. सामाजिक समानता का सपना (Vision of Social Equality)
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि RTE अधिनियम, 2009 का उद्देश्य केवल मुफ्त शिक्षा देना नहीं है, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों को एक साथ लाना है। कोर्ट ने कहा कि जब अलग-अलग आर्थिक स्थितियों वाले बच्चे साथ में बड़े होते हैं, तो वे एक-दूसरे के संघर्षों और जीवन को बेहतर समझ पाते हैं। इससे समाज में भेदभाव कम होता है और आपसी समझ बढ़ती है।
3. ‘बंधुत्व’ (Fraternity) को बढ़ावा
संविधान की प्रस्तावना में ‘बंधुत्व’ (Fraternity) एक प्रमुख शब्द है। कोर्ट ने कहा कि बंधुत्व केवल किताबों में पढ़ाने से नहीं आएगा। यह तब आएगा जब बच्चे बचपन से ही एक-दूसरे के साथ घुलेंगे-मिलेंगे। अगर अमीर बच्चे केवल महंगे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ेंगे और गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में, तो समाज हमेशा बंटा रहेगा। RTE की धारा 12(1)(c), जो प्राइवेट स्कूलों में 25% गरीब बच्चों के आरक्षण की बात करती है, इसी सोच पर आधारित है।
4. मनोवैज्ञानिक बाधाएं तोड़ना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाज में अमीरी और गरीबी के बीच एक ‘मनोवैज्ञानिक दीवार’ खड़ी है। RTE एक्ट इस दीवार को तोड़ने का प्रयास करता है। जब एक जज का बच्चा और एक फेरीवाले का बच्चा स्कूल में एक साथ टिफिन शेयर करेंगे और खेलेंगे, तो उनके मन में ऊंच-नीच की भावना जन्म नहीं लेगी। यह देश की एकता और अखंडता के लिए बहुत जरूरी है।
5. स्कूलों की जिम्मेदारी
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राइवेट स्कूलों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी होगी। वे खुद को केवल अमीर वर्ग (Elite) तक सीमित नहीं रख सकते। उन्हें EWS (आर्थिक रूप से कमजोर) कोटे के तहत दाखिला देना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि गरीब बच्चों के साथ स्कूल के अंदर कोई भेदभाव न हो। शिक्षा एक व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी RTE एक्ट की आत्मा को दर्शाती है। यह फैसला हमें याद दिलाता है कि शिक्षा वह हथियार है जो न केवल करियर बनाता है, बल्कि एक बेहतर और समान समाज का निर्माण भी करता है। जज और फेरीवाले के बच्चों का साथ पढ़ना ही एक विकसित भारत की असली तस्वीर है।
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