HC: सिविल जज ‘तलाक’ पर फैसला नहीं दे सकते

HC: सिविल जज 'तलाक' पर फैसला नहीं दे सकते:-

1. परिचय (Introduction)

 

HC: सिविल जज ‘तलाक’ पर फैसला नहीं दे सकते,मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक और विवाह विच्छेद (Dissolution of Marriage) को लेकर अक्सर यह भ्रम रहता है कि कानूनी मुहर लगवाने के लिए किस अदालत में जाना चाहिए। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने इस भ्रम को दूर करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक ‘सिविल जज’ (Civil Judge) के पास मुस्लिम विवाह को खत्म करने या तलाकनामे को प्रमाणित (Authenticate) करने का अधिकार नहीं है। कानूनन यह शक्ति विशेष रूप से ‘फैमिली कोर्ट’ (Family Court) को दी गई है। “Gauhati HC: सिविल जज के पास मुस्लिम तलाक प्रमाणित करने का अधिकार नहीं है। यह शक्ति केवल फैमिली कोर्ट के पास है। जानिए क्षेत्राधिकार के नियम।”

2. मामला क्या था? (The Core Issue)

यह मामला एक याचिका से जुड़ा था जिसमें एक सिविल जज द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी गई थी। सिविल जज ने एक मुस्लिम पति द्वारा दिए गए तलाक को प्रमाणित कर दिया था और शादी खत्म करने की डिक्री जारी कर दी थी। सवाल यह था कि क्या सामान्य दीवानी अदालत (Civil Court) फैमिली कोर्ट के होते हुए ऐसे मामलों की सुनवाई कर सकती है? क्या सिविल जज के पास तलाकनामा को ‘वैध’ घोषित करने की शक्ति है?

3. फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 का नियम

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने Family Courts Act, 1984 की धारा 7 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी क्षेत्र में फैमिली कोर्ट स्थापित हो जाता है, तो विवाह और तलाक से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई का अधिकार सिर्फ उसी के पास होता है। सामान्य सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) वहां खत्म हो जाता है। इसलिए, सिविल जज द्वारा तलाक पर फैसला देना कानूनन गलत और अधिकार क्षेत्र से बाहर (Null and Void) है।

4. सिविल जज ‘काजी’ नहीं हैं

कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि सिविल जज का काम केवल दस्तावेजों पर मुहर लगाना नहीं है। मुस्लिम कानून के तहत तलाक एक धार्मिक और सामाजिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब इसे कानूनी रूप देना हो, तो कोर्ट को पूरी न्यायिक प्रक्रिया (Trial) का पालन करना होता है। सिविल जज किसी ‘काजी’ की तरह तलाकनामे को केवल देखकर प्रमाणित नहीं कर सकते। वैवाहिक स्थिति की घोषणा करने का अधिकार विशेष अधिनियम के तहत फैमिली कोर्ट को मिला है।

5. सही कानूनी प्रक्रिया

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी मुस्लिम दंपत्ति को तलाक या विवाह विच्छेद की डिक्री चाहिए, तो उन्हें सक्षम फैमिली कोर्ट में याचिका दायर करनी चाहिए। फैमिली कोर्ट में काउंसलिंग और सुलह की प्रक्रिया होती है, जो सिविल कोर्ट में सामान्यतः नहीं होती। इसलिए, फैमिली कोर्ट ही ‘सक्षम मंच’ (Competent Forum) है।


निष्कर्ष

गुवाहाटी हाई कोर्ट का यह फैसला न्यायिक अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी है। यह सुनिश्चित करता है कि पारिवारिक विवादों को संवेदनशील तरीके से सुलझाने के लिए बनाए गए ‘फैमिली कोर्ट्स’ की अनदेखी न हो। वादियों को अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि तलाक के कानूनी मामलों के लिए उन्हें सिविल जज के पास नहीं, बल्कि फैमिली कोर्ट जाना है।


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