'निराशाजनक': पूर्व जजों ने उमर खालिद और शरजील इमाम की बेल खारिज करने पर सुप्रीम कोर्ट को घेरा
‘निराशाजनक’: पूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज करने के फैसले की आलोचना की
1. परिचय (Introduction)
दिल्ली दंगों की साजिश के आरोप में जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने के बाद कानूनी गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। जहां एक तरफ कोर्ट ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें रिहा करने से मना कर दिया, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जजों (Former Judges) ने इस फैसले को “बेहद निराशाजनक” और “न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ” बताया है। यह मामला अब सिर्फ एक बेल (Bail) का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) बनाम कड़े कानूनों (UAPA) की लड़ाई बन गया है। पूर्व जजों का मानना है कि ‘बेल इज रूल, जेल इज एक्सेप्शन’ का पुराना सिद्धांत अब खत्म होता दिख रहा है।
2. पूर्व जजों की तीखी प्रतिक्रिया (Sharp Criticism by Ex-Judges)
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) मदन बी. लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता जैसे वरिष्ठ कानूनविदों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट, जिसे नागरिकों के अधिकारों का रक्षक माना जाता है, अगर वह भी इतने लंबे समय तक जेल में रहने के बावजूद जमानत नहीं देगा, तो यह चिंताजनक है। पूर्व जजों ने इस फैसले को नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) के लिए एक बड़ा झटका बताया है। उनका कहना है कि बिना ट्रायल के सालों तक किसी को जेल में रखना सजा देने जैसा ही है।
3. ‘ट्रायल के बिना सजा’ (Punishment Without Trial)
आलोचना का मुख्य बिंदु यह है कि उमर खालिद और शरजील इमाम पिछले कई सालों (2020 से) से जेल में हैं। अभी तक उनका ट्रायल (मुकदमा) भी ठीक से शुरू नहीं हुआ है। पूर्व जजों का तर्क है कि UAPA जैसे कानूनों में ट्रायल पूरा होने में दशकों लग सकते हैं। ऐसे में, अगर आरोपी को जमानत नहीं दी जाती, तो वह पूरी जिंदगी जेल में ही बिता देगा, भले ही बाद में वह निर्दोष साबित हो जाए। यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
4. UAPA की सख्त शर्तों पर सवाल (Questions on UAPA Stringency)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) का हवाला दिया, जो कहती है कि अगर पुलिस के आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई (Prima Facie True) लगती है, तो बेल नहीं मिल सकती। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कोर्ट को केवल पुलिस की चार्जशीट पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि सबूतों की गहराई में जाकर देखना चाहिए। पूर्व जजों ने कहा कि “साजिश” (Conspiracy) साबित करना बहुत मुश्किल होता है, और सिर्फ भाषणों के आधार पर किसी को अनिश्चित काल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता।
5. ‘बेल नियम है, जेल अपवाद’ सिद्धांत का क्या हुआ?
जस्टिस कृष्णा अय्यर का प्रसिद्ध सिद्धांत था— “Bail is the rule, jail is the exception”। पूर्व जजों ने दुख जताया कि UAPA के मामलों में यह नियम उलट गया है। अब “Jail is the rule” बन गया है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को राज्य (State) की शक्ति और नागरिक की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना चाहिए था, लेकिन इस फैसले में वह संतुलन नहीं दिखा।
निष्कर्ष
पूर्व जजों की यह आलोचना बताती है कि भारत में UAPA के तहत जमानत मिलना कितना मुश्किल हो गया है। यह फैसला भविष्य के लिए एक कठिन नजीर (Precedent) बन सकता है, जहाँ विरोध प्रदर्शन और भाषणों को ‘आतंकवाद’ की श्रेणी में रखकर लंबी हिरासत को सही ठहराया जाएगा। कानूनी जानकारों के लिए यह फैसला पुनर्विचार का विषय है।
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