सुप्रीम कोर्ट का मेडिकल नेगलिजेंस (चिकित्सीय लापरवाही) और सेवा में कमी (Deficiency in Service) से जुड़ा है।

 

यह सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला है, जो मरीजों के अधिकारों और अस्पतालों की जवाबदेही (Accountability) को मजबूत करता है। यह मामला मेडिकल नेगलिजेंस (चिकित्सीय लापरवाही) और सेवा में कमी (Deficiency in Service) से जुड़ा है।


⚖️ केस का नाम और मुख्य फैसला

केस: वेस्ट बंगाल क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स रेगुलेटरी कमीशन बनाम बी.एम. बिड़ला हार्ट रिसर्च सेंटर और अन्य (2024)

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट, 2017 के तहत बना ‘कमीशन’ केवल रजिस्ट्रेशन देखने वाली संस्था नहीं है। यह कमीशन मरीजों की सेवा में कमी (Deficiency in Patient Service) और लापरवाही के मामलों की सुनवाई कर सकता है और मुआवजा (Compensation) देने का आदेश भी दे सकता है।


1. मामले के तथ्य (Facts of the Case)

  • घटना: एक महिला मरीज (रेणु सहगल) को कोलकाता के बी.एम. बिड़ला हार्ट रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया था। वहां उनकी एंजियोप्लास्टी (PTCA) की गई, लेकिन दुर्भाग्यवश प्रक्रिया के दौरान या उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।

  • आरोप: मृतक के परिवार ने आरोप लगाया कि इलाज में लापरवाही बरती गई और अस्पताल ने उचित देखभाल (Patient Care) प्रदान नहीं की।

  • कमीशन का एक्शन: परिवार ने ‘वेस्ट बंगाल क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स रेगुलेटरी कमीशन’ में शिकायत की। कमीशन ने अस्पताल को लापरवाही का दोषी माना और पीड़ित परिवार को 20 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

  • हाई कोर्ट का रुख: अस्पताल ने इस आदेश को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने कहा कि यह कमीशन “कंज्यूमर फोरम” नहीं है और यह मेडिकल नेगलिजेंस या इलाज की गुणवत्ता पर फैसला नहीं कर सकता। हाई कोर्ट ने कमीशन के आदेश को रद्द कर दिया।

  • सुप्रीम कोर्ट में अपील: कमीशन और पीड़ित परिवार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


2. कानूनी धाराएं (Important Sections/Acts)

इस मामले में मुख्य रूप से West Bengal Clinical Establishments (Registration, Regulation and Transparency) Act, 2017 की चर्चा हुई:

  • Section 38 (धारा 38): यह धारा कमीशन को शक्ति देती है कि वह शिकायतों को सुन सके और अगर अस्पताल नियमों का पालन नहीं करता या मरीज की देखभाल में कोताही बरतता है, तो कार्रवाई करे।

  • Deficiency in Service (सेवा में कमी): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ‘इलाज’ भी एक सेवा है और अगर उसमें कमी है, तो यह एक्ट लागू होगा।


3. सुप्रीम कोर्ट का तर्क (Supreme Court’s Reasoning)

जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा:

  1. कमीशन की शक्ति: 2017 का कानून सिर्फ अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन करने के लिए नहीं बना है, बल्कि इसका उद्देश्य मरीजों को सस्ता और जल्दी न्याय दिलाना है।

  2. विशेषज्ञता: कमीशन में मेडिकल एक्सपर्ट्स भी होते हैं, इसलिए वे यह तय करने में सक्षम हैं कि इलाज में लापरवाही हुई है या नहीं।

  3. सिविल कोर्ट का विकल्प: कोर्ट ने कहा कि हर छोटे मामले के लिए मरीज को लंबी चलने वाली सिविल कोर्ट प्रक्रिया में भेजना सही नहीं है। एक्ट का उद्देश्य ही “Curative” (सुधारात्मक) है।

  4. सेवा में कमी: अगर अस्पताल प्रोटोकॉल का पालन नहीं करता (जैसे ऑक्सीजन न देना, गलत दवा देना, समय पर अटेंड न करना), तो यह ‘सेवा में कमी’ है और कमीशन इस पर फैसला ले सकता है।


4. फैसले का महत्व (Impact)

  • मरीजों के लिए जीत: अब पश्चिम बंगाल में मरीजों को लापरवाही के खिलाफ शिकायत करने के लिए केवल कोर्ट या कंज्यूमर फोरम पर निर्भर नहीं रहना होगा। वे सीधे कमीशन के पास जा सकते हैं।

  • अस्पतालों के लिए चेतावनी: अस्पतालों को अब अपनी सेवाओं और प्रोटोकॉल को लेकर अधिक सतर्क रहना होगा, क्योंकि रेगुलेटरी कमीशन सीधे हर्जाना लगा सकता है।

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